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सोमवार, 21 मई 2012

अब क्या तुझे अर्पण करूँ ? तू है सकल, मैं हूँ विकल











(उस परमपिता को समर्पित , मैं जिसका अंश था। इस संसार के मायाजाल में आकर मैने जिसे भुला दिया था। पर ये उम्मीद ज़रूर रखता हूँ कि मैं अधम एक दिन उसमें विलीन हो जाऊँगा और वो तब भी स्निग्ध और धवल रहेगा।)
"एको हि दोषो गुणसन्निपाते निमज्जितीन्दोः किरणेष्विवांकः"


            अब क्या तुझे अर्पण करूँ ? तू है सकल, मैं हूँ विकल

 तुम नैन मूँदे हो खड़े
हम घोर दुविधा में पड़े
अवसाद ले कुण्ठित रहें
या बात कुछ आगे बढ़े 

तू  ही बता दे प्रीत की  , कैसे भला होगी पहल  ?
अब क्या तुझे अर्पण करूँ ? तू है सकल, मैं हूँ विकल


सब  ज्ञात तुझको मर्म हैं
दूषित मेरे सब कर्म हैं
सब भाँति पातक में सने
ये अस्थि-मज्जा-चर्म हैं

लाऊँ कहाँ से मैं भला ?  सेवा ,तपस्या ,पुण्यबल
अब क्या तुझे अर्पण करूँ ? तू है सकल, मैं हूँ विकल

जग भ्रन्तियों का जाल है
उलझा मनुज कंकाल है
शर काम-धनु से आ लगा
अब वाणबिद्ध मराल है

संसार से आहत , तेरे सान्निध्य  से भी बेदख़ल
अब क्या तुझे अर्पण करूँ ? तू है सकल, मैं हूँ विकल

हे देव ! अब उपकार कर
मुझ हीन को स्वीकार कर
बन विधु बहा दे ज्योत्सना
ये कलंक अंगीकार कर

छुप जाये सागर क्षीर में ,खारा मेरा ये अश्रुजल
अब क्या तुझे अर्पण करूँ ? तू है सकल, मैं हूँ विकल


22 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्‍तुति। आपका मेरे पोस्ट पर आना बहुत ही अच्छा लगा । मेरी कामना है कि आप अहर्निश सृजनरत रहें । मेरे नए पोस्ट अमीर खुसरो पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद । Please remove word verification.

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  2. बेहतरीन शाब्दिक अलंकरण लिए स्तुति..... अति सुंदर

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  3. बहुत खूब अंजनी जी .... हर कोई एक दिन शुरुयात ही करता है

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  4. "छुप जाये सागर क्षीर में ,खारा मेरा ये अश्रुजल
    अब क्या तुझे अर्पण करूँ ? तू है सकल, मैं हूँ विकल"

    बहुत अच्छा लिखते हो भाई.. शब्द चयन भी बहुत सुन्दर और उतने ही सुन्दर भाव... और ये जानकार और भी ख़ुशी हुई की आप भी 1988 के हैं और हम भी.. दोनों भोजपुरिया हैं, और दोनों ने २००६ में IIT- JEE उत्तीर्ण की!! बस अनुसन्धान की ओर रुझान ने मुझे मिशिगन पहुंचा दिया. बहुत शुभकामनाएं आपको!! :)

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    1. हम दोनों में इतनी समानतायें हैं...ये जानकर बहुत अच्छा लगा मधुरेश जी
      उत्साह्ववर्धन के लिये धन्यवाद
      आपको भी मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनायें साहित्य सृ्जन के लिये

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    2. अरे वाह!! अंजनी के साथ मधुरेश फ्री !!......अभिनन्दन दोनों का .....

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  5. ईश्वर के प्रति समर्पित ये मधुर भाव मन की विकलता को उजागर करते हैं। कविता का लय मन को बरबस हरता है और छ्न्द इसे एक नई ऊंचाई देते हैं।

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  6. सर , मैं बहुत आभारी हूँ जो आपने इस स्तुति में छिपे भावों को पहचाना...बहुत बहुत धन्यवाद

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  7. बहुत सुंदर अंजनी जी....
    जैसे प्यारे शब्द वैसे ही भाव..................
    बहुत खूबसूरत रचना

    अनु

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  8. मै नर हूँ तुम नारायण हो ...... बहुत अच्छी रचना ..गाने का भी मन है ....

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  9. अंजनी कुमार जी ,

    आभार मेरे ब्लॉग तक आने के लिए .... जिसके कारण मैं आपके ब्लॉग तक पहुँच पायी ....

    आपके ब्लॉग की सारी ही रचनाएँ पढ़ ली हैं ... हर रचना बहुत भाव और प्रवाह पूर्ण ...उत्कृष्ट रचनाएँ हैं .... आभार

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  10. बहुत ही बेहतरीन रचना....
    मेरे ब्लॉग

    विचार बोध
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  11. aapki vikalata man ko pavitra karnevaali hai.
    shaandaar prastuti ke liye aabhaar.

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  12. बहुत सुन्दर प्रार्थना.

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  13. पहली बार आपको पढ़ा..ब्लॉग पे आना सार्थक रहा...इस कविता क लिए मैं निः शब्द हूँ...दिल भर आया बस यही कहूँगी....

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