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रविवार, 8 जुलाई 2012

उसी मदरसे में हमने - भाग 1


(ये मेरी पहली रचना थी। "उसी मदरसे में हमने दीवानेपन का सबक पढ़ा है " सुनने में थोड़ा अजीब लगता होगा। पर असल में ये दीवानापन पराकाष्ठा है- निष्ठा की , भक्ति की, साधना की, समर्पण की। भक्त जब अपने उपास्य के प्रेम में अपनी सुध बुध बिसरा देता है, तब वो दीवाना कहलाने लगता है। इसी दीवानेपन को तलाशने की कोशिश की है मैने-प्रकृति में, संस्कृति में,भक्ति में। आशा है आपको पसन्द आयेगी।)

 



मतवाला मौलवी जहाँ पर, अलबेला शागिर्द खड़ा है

उसी मदरसे में हमने, दीवानेपन का सबक पढ़ा है

 

 

 

 

 

 इन्द्रधनुष की चादर ओढ़े ,जब नभ का मुखड़ा खिल आया

प्रेमी के सम्मुख धरती ने ,घूंघट को तब तनिक उठाया

अनुरागी वसुधा पर जब -जब, हरीतिमा का रंग चढ़ा है

तभी मदरसे में हमने, दीवानेपन का सबक पढ़ा है 

 

 

 

 

 

 

अविचल सिन्धु साधना का ,या मतवालेपन का यह निर्झर

कर आया है पार युगों को ,कालिदास की कविता बनकर

लेकर प्रेमी का संदेशा  , मेघदूत जब कभी उड़ा है

तभी मदरसे में हमने, दीवानेपन का सबक पढ़ा है

 

 

 

 

 

 अल्हड़पन, दीवानापन, निष्ठा या भक्ति कहो तुम इसको

साधक जिसे साधना या फिर फक्कड़ कहे फक्कड़ी जिसको

जिस बाजार में मस्त कबीरा,अपना ही घर फूँक खड़ा है

उसी मदरसे में हमने, दीवानेपन का सबक पढ़ा है

 

 

 

 

 

 मुझे लगा दीवाना योगी, बैठा था जो भस्म रमाकर

विह्वल हो जो नाची मीरा, श्याम रंग ओढ़नी रंगाकर

श्याम सलोना उसका नटवर, लिये बाँसुरी जहाँ खड़ा है

उसी मदरसे में हमने, दीवानेपन का सबक पढ़ा है

 

 

  


 

 आत्मार्पण करने जगती में ,जब कोई दीवाना आये

चिर अकाट्य इस प्रेमपाश में, ईश्वर भी सहर्ष बंध जाये

जूठे बेर खिलाकर प्रभु को ,जहाँ प्रेम का मान बढ़ा है

उसी मदरसे में हमने, दीवानेपन का सबक पढ़ा है

 

 

 

 

 

 

 दीवाने बलिदानव्रती को ,मोह नही निज जीवन का है

हर्षित होकर जीवन वारूँ, अवसर ना ये क्रन्दन का है

हो जाये बलिदान चन्द्र पर ,जिद पर  जहाँ चकोर अड़ा है

उसी मदरसे में हमने ,  दीवानेपन का सबक पढ़ा है

 

 

 

 

 

 

 

 

ज्ञान-भक्ति के इस विवाद में, विजय सदैव भक्ति की होगी

ज्ञान अपूर्ण, भक्ति है पूरी, कहता यही प्रेम का योगी

शुष्क ज्ञान से उद्धव के, गोपी का निश्छल प्रेम लड़ा है

तभी मदरसे में हमने ,  दीवानेपन का सबक पढ़ा है


 


 

 

 


 


 





15 टिप्‍पणियां:

  1. उसी मदरसे में हमने, दीवानेपन का सबक पढ़ा है
    अति सुन्दर .... हमें पढ़वाने के लिए शुक्रिया .... !!

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  2. मुझे लगा दीवाना योगी, बैठा था जो भस्म रमाकर
    विह्वल हो जो नाची मीरा, श्याम रंग ओढ़नी रंगाकर
    श्याम सलोना उसका नटवर, लिये बाँसुरी जहाँ खड़ा है
    उसी मदरसे में हमने, दीवानेपन का सबक पढ़ा है

    लाजबाब प्रस्तुति,सुंदर रचना,,,,,,,

    RECENT POST...: दोहे,,,,

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  3. आपकी दीवानगी अनूठी और कमाल की है अंजनी जी.
    अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार.

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  4. बहुत सुन्दर सृजन , सुन्दर भावाभिव्यक्ति , बधाई .

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  5. अविचल सिन्धु साधना का ,या मतवालेपन का यह निर्झर
    कर आया है पार युगों को ,कालिदास की कविता बनकर
    लेकर प्रेमी का संदेशा , मेघदूत जब कभी उड़ा है
    तभी मदरसे में हमने, दीवानेपन का सबक पढ़ा है
    यही तो रास है भाई साहब समर्पण है पूर्ण .शानदार प्रस्तुति .

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  6. बहुत उत्कृष्ट भावमयी प्रस्तुति.

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  7. उत्कृष्ट अभिव्यक्ति ... इस दीवानेपन का कमाल एक सार्थक, लाजवाब गेयता लिए जबरदस्त रचना के रूप में हुवा है ... बधाई इस रचना के लिए ...

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  8. बहुत सुन्दर रचना अंजनी जी....

    आपको इस सुन्दर रचना के सृजन की बधाई ...

    अनु

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  9. बहुत बहुत .... सुंदर रचना !
    शब्द नहीं हैं मेरे पास !!
    प्रेम को बहुत खूब संजोया है आपने अपनी इस रचना में
    बधाई इस सुंदर सी रचना के लिए !!

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  10. बहुत अच्छा लिखते हो ...
    शुभकामनायें !

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  11. बहुत सुन्दर भाव लिए उत्कृष्ट अभिव्यक्ति ...शुभकामनायें !

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  12. बहुत सुन्दर और सार्थक सृजन , आभार.

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारकर अपनी शुभकामनाएं प्रदान करें.

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  13. कल 24/07/2012 को आपकी यह पोस्ट (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  14. .


    बंधु
    कमाल का दीवानापन है !
    :)

    आपकी सारी गीत रचनाएं पढ़ने के लिए फिर से तसल्ली से आना पड़ेगा …

    शुभकामनाओं सहित …

    उत्तर देंहटाएं